में फिल्म अभिनेता इमरान हाशमी को मकान नहीं मिलना कोई नई बात नहीं है। बात मुसलमान अभिनेता होने की नहीं है। कई मुस्लिम हि दू परिवारों में जहां पेईंग गेस्ट के रूप में रह रहे हैं, वहीं एक अदद श स अपनी श िसयत यदि बताता है तो निश्चित ही किसी दुराभाव को दर्शाता होगा। यदि इमरान हाशमी एक स"ो मुसलमान होते तो फिल्मों में दिखाए जा रहे अपने चरि ाों का अनुसर ा अपने निजी जीवन में नहीं करते। या वे अपनी फिल्म के अंत .... को ताजा करना चाहते हैं जिसमें जो उनकी प्रेयसी रही अभिने ाी ने ही उ हें दिल से तो दूर कर ही दिया था, अपितु दुनिया से दूर करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
रविवार, 2 अगस्त 2009
मकान न मिलना चरित्र को तय करता हे
गुरुवार, 28 मई 2009
एक राजनीतिज्ञ की हत्या..........?
एक राजनीति ा की ह या..........?
अजीज श सोसूरत, बोलने का एक अलग ही
अंदाज। हरएक मन में बसी हुई वह तस्वीर जो
पिछले चार दशक से राजनीति के मंच पर विराजित
था अचानक मंच से कहां खिसक गया, या खिसका
दिया। कुछ भी समझ नहीं आया।
वह रिटायरमेंट या ार बैठने या कोप भवन में
विराजित हैं कुछ तय नहीं है। कुछ तो बात है जो
इस बार के महासमर में बिना टिका-टि प ाी के
परदे की ओट में बैठे रहे और देखते रहे अपने द्वारा
निर्मित, अपने द्वारा सजाए एक ऐसा सपना जो
सिहांसन तक उ हें ले कर गया विराजित करवाया
और धड़ाम कर खिसका दिया। खिसकाया तो ऐसा
खिसकाया की अब दर्शन ही दुभर हो गए।
मैं बात कर रहा हूं कवि हृदय, वाक चातुर्य,
ओजस्वी वक्ता, मुखर राजनीतिक हस्ती माननीय
अटलबिहारी वाजपेयी की। जो पिछले 4 दशक से
राजनीति के मंच पर आसीन थे। जो भारतीय जनता
पार्टी के ज म समय से प्रमुख थे। आज उ हीं नेता
की छाया भी राजनीतिक मंच पर नहीं है। अनायास
ही लोग उ हें अपने से अलग-थलग समझ बैठे जो
पार्टी पिछले चुनावों में प्रथम पंक्ति में रही थी। स ाा
की लालसा ने पहले तो स ाा से धकेला फिर ऐसा
धकेला की पीछे ही पीछे खिसका दिया। जो कांग्रेस
पिछले चुनाव में दलों का दलदल बनकर सरकार
बना रही थी आज उसके ाटक दल स ाा के करीब
अपने दम पर पहुंच गए।
इतनी खराब स्थिति में उस ाटक दल की जिसकी
पिछले चुनाव के पूर्व अपनी सरकार रही थी। और
सभी सर्वेक्ष ा कंपनियों ने दावा किया था कि
स ाापक्ष के विरुद्ध ही वोट दिया जाएगा और विपक्ष
में बैठी राजग ही सबसे बड़ी पार्टी होगी। पर हुआ
उलटा विपक्ष अपना स्वयं का पक्ष ही नहीं बचा पाई
और मुहाने पर जा बैठी।
यदि लालकृष् ा आडवा ाी, नरेंद्र मोदी को सक्रिय
कहें तो पूर्व प्रधानमं ाी अटलबिहारी वाजपेयी जो
इस चुनाव परिदृश्य से बिलकुल अलग रहने को
या कहें।
जब से प्रधानमं ाी पद के दावेदार माननीय
लालकृष् ा आडवा ाी को बनाया गया तब उनका
बयान मा ा आया था में अब भी लाइन में हू्ं...।
फिर या हुआ लाइन कहां टूट गई। और एक
सक्रिय राजनेता बिलकुल गुप्त लाइन में कैसे चला
गया। या वे इतने बीमार हैं कि वो मीडिया के
सामने भी नहीं आ पाए। न ही उनके बयान ही
मीडिया को मिले। जो भी कुछ दिखा वो लाल ही
लाल दिखा और देश की जनता ने लाल के कृष् ा
को तिरंगा भेंट कर दिया।
ये भारतीय जनता पार्टी की अंदर की बात हैं पर
एक टीस तो बाकी रह ही गई, आखिर लालकृष् ा
आडवा ाी बकौल प्रधानमं ाी पद के दावेदार ही रह
गए और फिर से विपक्ष की आसंदी को संभाल रहे
हैं। पर चबुतरा राज को खबर है कि ऐसा कांग्रेस में
ही नहीं भाजपा में हर छोटे से छोटे कस्बे में देखने
को मिल जाएगा, किसी को सक्रियता का ताज तो
किसी को निष्क्रियता का जामा पहनाने में कोई भी
किसी से कम नहीं है। ये तो आने वाला चबुतरा
राज ही बताएगा कैसे या हुआ?
अजीज श सोसूरत, बोलने का एक अलग ही
अंदाज। हरएक मन में बसी हुई वह तस्वीर जो
पिछले चार दशक से राजनीति के मंच पर विराजित
था अचानक मंच से कहां खिसक गया, या खिसका
दिया। कुछ भी समझ नहीं आया।
वह रिटायरमेंट या ार बैठने या कोप भवन में
विराजित हैं कुछ तय नहीं है। कुछ तो बात है जो
इस बार के महासमर में बिना टिका-टि प ाी के
परदे की ओट में बैठे रहे और देखते रहे अपने द्वारा
निर्मित, अपने द्वारा सजाए एक ऐसा सपना जो
सिहांसन तक उ हें ले कर गया विराजित करवाया
और धड़ाम कर खिसका दिया। खिसकाया तो ऐसा
खिसकाया की अब दर्शन ही दुभर हो गए।
मैं बात कर रहा हूं कवि हृदय, वाक चातुर्य,
ओजस्वी वक्ता, मुखर राजनीतिक हस्ती माननीय
अटलबिहारी वाजपेयी की। जो पिछले 4 दशक से
राजनीति के मंच पर आसीन थे। जो भारतीय जनता
पार्टी के ज म समय से प्रमुख थे। आज उ हीं नेता
की छाया भी राजनीतिक मंच पर नहीं है। अनायास
ही लोग उ हें अपने से अलग-थलग समझ बैठे जो
पार्टी पिछले चुनावों में प्रथम पंक्ति में रही थी। स ाा
की लालसा ने पहले तो स ाा से धकेला फिर ऐसा
धकेला की पीछे ही पीछे खिसका दिया। जो कांग्रेस
पिछले चुनाव में दलों का दलदल बनकर सरकार
बना रही थी आज उसके ाटक दल स ाा के करीब
अपने दम पर पहुंच गए।
इतनी खराब स्थिति में उस ाटक दल की जिसकी
पिछले चुनाव के पूर्व अपनी सरकार रही थी। और
सभी सर्वेक्ष ा कंपनियों ने दावा किया था कि
स ाापक्ष के विरुद्ध ही वोट दिया जाएगा और विपक्ष
में बैठी राजग ही सबसे बड़ी पार्टी होगी। पर हुआ
उलटा विपक्ष अपना स्वयं का पक्ष ही नहीं बचा पाई
और मुहाने पर जा बैठी।
यदि लालकृष् ा आडवा ाी, नरेंद्र मोदी को सक्रिय
कहें तो पूर्व प्रधानमं ाी अटलबिहारी वाजपेयी जो
इस चुनाव परिदृश्य से बिलकुल अलग रहने को
या कहें।
जब से प्रधानमं ाी पद के दावेदार माननीय
लालकृष् ा आडवा ाी को बनाया गया तब उनका
बयान मा ा आया था में अब भी लाइन में हू्ं...।
फिर या हुआ लाइन कहां टूट गई। और एक
सक्रिय राजनेता बिलकुल गुप्त लाइन में कैसे चला
गया। या वे इतने बीमार हैं कि वो मीडिया के
सामने भी नहीं आ पाए। न ही उनके बयान ही
मीडिया को मिले। जो भी कुछ दिखा वो लाल ही
लाल दिखा और देश की जनता ने लाल के कृष् ा
को तिरंगा भेंट कर दिया।
ये भारतीय जनता पार्टी की अंदर की बात हैं पर
एक टीस तो बाकी रह ही गई, आखिर लालकृष् ा
आडवा ाी बकौल प्रधानमं ाी पद के दावेदार ही रह
गए और फिर से विपक्ष की आसंदी को संभाल रहे
हैं। पर चबुतरा राज को खबर है कि ऐसा कांग्रेस में
ही नहीं भाजपा में हर छोटे से छोटे कस्बे में देखने
को मिल जाएगा, किसी को सक्रियता का ताज तो
किसी को निष्क्रियता का जामा पहनाने में कोई भी
किसी से कम नहीं है। ये तो आने वाला चबुतरा
राज ही बताएगा कैसे या हुआ?
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